दक्षिण अफ्रीका में विदेशी व बाहरी लोगों पर हुये हालिया हमलों के लिये डेविड सरकार को दोषी ठहराते हैं: “विदेशियों से जितनी नफरत दक्षिण अफ्रीकी करते हैं उतना शायद कोई नहीं करता। दक्षिण अफ्रीका आधिकारिक रूप से विश्व का सर्वाधिक ज़ीनोफोबिक (xenophobic) देश माना जाता है। नफरत तक ठीक है पर 50 अप्रवासियों की हत्या के गुनाह का क्या अर्थ है? राष्ट्रपति थाबो म्बेकी ने इस कृत्य को शर्मनाक बताया हे पर मैं मानता हूं कि यह घृणित काम है। यह कानूनन जुर्म है और दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिये।”
Latest stories परिचय War & Conflict
18 June 2008
इराक : श्याम रंग – विषाद का रंग
इराकी स्त्रियाँ शोक और विषाद के रंग - काले रंग - की अभ्यस्त हो चुकी हैं. इनसाइड इराक में यह बात कही गई है. अंधेरे और उदासी के श्याम रंग से इतर अब कुछ युवा स्त्रियाँ भूरे, हरे और गुलाबी परिधानों को अपना रही हैं !
28 May 2008
15 May 2008
भारत: जयपुर बम धमाका, आतंकवाद और सरकार
13 मई को लगातार हुए बम धमाकों ने जयपुर को हिलाकर रख दिया . विविध रपटों के अनुसार, कोई 60 से अधिक लोग मारे गए व 150 से अधिक लोग...
23 April 2008
जापान : यौन दासियों की लंबित मांगों पर ध्यान खींचते वीडियो
द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के साठ साल से अधिक बीत जाने के बाद भी जापानी सेना के आदेशों के तहत अपहृत की गई स्त्रियाँ अब भी न्याय की...
7 April 2008
श्रीलंकाः बम धमाका और अनवरत संघर्ष
श्रीलंकाई सरकार के एक महत्वपूर्ण मंत्री और वरिष्ठ सांसद जयराज फर्नांडोपुल्ले की लिट्टे ने हत्या कर दी। बम धमाका करने वाला एक मेराथन धावक का भेस धरकर आया था। डिफेंसनेट...
27 November 2007

इरानः अमरीकी सैनिक और इराकी बच्चे
रज़ेनो ने इराक में बच्चों की देखरेख करते अमरीकी सैनिकों की कई तस्वीरें प्रकाशित की हैं। इस चिट्ठाकार का कहना है कि इरानी मीडिया कभी ऐसी तस्वीरें नहीं छापता। भले ही युद्ध एक स्याह दास्तां हो पर इनमें मानवीय संवेदनायें भी तो शामिल रहती हैं।
आगे पढ़ें »24 November 2007

यूक्रेनः प्रदर्शनी का सच?
मॉस्को में होलोडोमोर प्रदर्शनी में कलाविध्वंस (वैंडेलिज़्म) की घटना पर वहाँ के मेयर युरी लुज़कोव ने कहा, “मुझे लगता है कि इस प्रदर्शनी का बस एक ही मकसद थाः रूसी और युक्रेनी लोगों का एका तोड़ना और उनमें दरार पैदा करना।” यूक्रेनियाना इस तर्क को होलोकास्ट के परिपेक्ष्य में भी…
आगे पढ़ें »3 November 2007

आर्मीनियाः खुला पत्र
तुर्की लेखक व चिट्ठाकार मुस्तफा अक्योल की आर्मीनियाई जातिसंहार विषय पर आप्रवासी आर्मीनियाई को लिखे खुले पत्र का जवाब “लाईफ इन आर्मीनिया” चिट्ठे के लेखक रफी ने तुर्की नागरिकों को लिखे अपने खुले पत्र से दिया है। 1915 से 1917 के बीच हुई घटनाओं को जातिसंहर का दर्जा देते हुये वे लिखते हैं कि इस बकाया घटना का हमेशा के लिये हल निकालने का यह सही समय है ताकि आर्मीनियाई और तुर्क आगे बढ़ सकें और “अंततः एक दूसरे का साथ शाँतिपूर्वक जीना शुरु कर सकें”।
17 September 2007

युद्ध विरोध रैली से इराकी ही नदारद
इराक पंडित वाशिंगटन में एक युद्ध विरोध रैली में शामिल हुये पर, “मुझे इराकियों के वहाँ होने के संकेत ही नहीं मिले, भले कुछ वहाँ रहे हों। इराकियों ने इस मार्च का कोई लाभ नहीं उठाया कि वे अमेरीका पर इराक से सेना वापस लेने की माँग रखें। दरअसल आप रैली के बीचोंबीच खड़े होते, जैसे कि मैं था, और इराकियों को कोई ज़िक्र नहीं सुनते। कम से कम मैंने तो नहीं सुना।”
6 September 2007

इराकः क्या इस्लाम ही हल है?
इराक द मॉडल पूछते हैं क्या इराक में हिंसा के खात्मे का हल इस्लाम है? उनका जवाब है, “सचाई यह है कि राजनीतिक इस्लाम समस्या का हल नहीं वरन जड़ है। और ये केवल ईराक ही नहीं इस क्षेत्र के अन्य अनेक देशों के बारे में सच है जहाँ राजैनतिक इस्लामिक आंदोलनों की बहुतायत रही है। वे अपना व्याख्यान इस्लाम के कथित स्वर्ण युग से शुरु करते हैं और ये वायदा करते हैं कि अगर लोग इस्लाम की जड़ों की ओर लौटें तो एक नया स्वर्ण युग आयेगा…पर जब इस्लामी हुकुमत थी तब क्या हुआ था? किसी भी लिहाज से वो स्वर्ण युग तो नहीं था।”





























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देबू भाई कुछ दिनों से मन में एक विचार चल रहा था, लोरियों को जमा...