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देश:
India
विषय:
Arts & Culture, Entertainment
भाषाएं:
English

 

पूरे सप्ताह अपने काम में बेहद व्यस्त रहने वाले कुछ आईटी कर्मियों ने सप्ताहांत के दौरान भी व्यस्त रहने का काम खोज लिया है। उन्हें रंगमंच के कीड़े ने काट खाया है। “रिबेल्ज़” नामक इस समूह ने अपना एक ही उद्देश्य तय किया है और वह है चैन्नई में बढ़िया अंग्रेज़ी नाटकों का मंचन करना और कला का लुत्फ उठाना।

समुह में प्रमुख सदस्यों में से एक विनोद अपने इस उत्साह को छुपा नहीं पाते हैं

सप्ताहांत आते ही हम पूर्वाभिनय में मग्न हो जाते हैं। संवाद याद करना, अपने परिधान तय करना, और अपने दृश्यों की तैयारी करना। पुरे सप्ताह कोड की सेंकड़ों लाईन टाईप करने वालों के रटने के लिये पेज भर भर के संवाद। कॉफी और कोला से हम जगे रहते हैं, एक दूसरे से मज़ाक मस्ती के द्वारा अपनी उर्जा बनाये रखते हैं, आखिरकार हम दूसरों को हंसाने का गंभीर काम जो कर रहे हैं।

अगले नाटक “वंस अपॉन अ टाइम इन अरेबिया” का काम शुरु हो चुका है और 26 व 27 जुलाई को चैन्नई में इसके मंचन की दिनरात तैयारियाँ चल रही हैं। अगर आप इस दौरान शहर में रहें तो टिकट्सन्यू से अपनी टिकटें आरक्षित करा सकते हैं।

बंगलौर की दीपा हाल में देखे “द वुमन इन मी” को “बेहद भावप्रवण और दिलचस्प नाटक” बताती हैं। यह नाटक एक ऐसे व्यक्ति के बारे में है जिसकी अपनी पत्नि के हालिया देहांत से भावनात्मक संतुलन बिगड़ चुका है। मेटब्लॉग्स पर नाटक की समीक्षा में दीपा नाटक के एक दृश्य में छाया के प्रयोग और उसके परवर्ती दृश्य में संवादों की ताबड़तोड़ बौछार से अचंभित हो गईं

“इस नाटक ने मुझे हिला कर रख दिया। मैं इस बात से बेहद प्रभावित हुई कि इतने कमउम्र कलाकारों ने पुरुष व स्त्री की मनःस्थितो को बखूबी चित्रित किया और उस परिस्थिति का सटीक चित्रण किया है जब पुरुषों को यह भान भी नहीं होता के वे अपनी ही पत्नी के साथ बलात्कार कर रहे हैं।”

तान्या बेहरा ने अपने चिट्ठे “रिमेन कनेक्टेड” में अलायंस फ्रेंकाइज़ द्वारा आयोजित “लखनऊ 76″ की समीक्षा लिखी है।

“राजनीति व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले इस नाटक में एक आम आदमी की निगाह से 1876 और 1976 के लखनऊ शहर में आये बदलावों की बात है। 1876 अंग्रेज़ों के लिये एक मील का पत्थर है क्योंकि इसी साल साम्राज्ञी विक्टोरिया ने इस्ट इंडिया कंपनी से कमान संभाली। 1976 भी महत्वपूर्ण वर्ष रहा क्योंकि इसी साल एक समय लोकतंत्र रहा भारत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा तानाशाहाना रूप से घोषित इमरजेंसी के चपेट में आ गया था।”

गीताली तारे हिमवाणी में “द शिमला ट्रेजेडीः मिसिंग थियेटर, मिसिंग ड्रामा” में लिखती हैं

“सिनेमा की तरह नाटक एक तरफा, बना बनाया अनुभव नहीं होते। फिल्मों की तरह नाटकों में रिहर्सल के मौके तो मिलते हैं. पर “रीटेक” के नहीं। दर्शकों की तुरंत प्रतिक्रिया मिलती है, कलाकारों के भाव सीधे पहुंचते हैं। एक सधा रंगमंच कलाकार अपनी आवाज़, हावभाव और परिधान से दर्शकों को किसी और दुनिया में ले जा सकता है। दर्शक प्यारेलाल के जाने पर महात्मा गाँधी की खीज, अमृता के लिये ज़ुल्फ़ी की तड़प महसूस कर सकते हैं। वे धंसीजा बाटळीवाला के साथ हंसते भी हैं और मधुकर कुलकर्णी के वाक्छल में फंस जाते हैं। केके, नसीरुद्दीन शाह, दिनेश ठाकुर, अतुल कुलकर्णी, शबाना आज़मी, बोमन ईरानी, मेहरबानो मोदी कोतवाल, राहुल डाकुन्हा, फिरोज़ खान, संजना कपूर, शेरनाज़ पटेल, रजित कपूर, जयती भाटियाः ये दो घंटों में आपको अपने अनुभव के संसार में दाखिल होने देते हैं।”

मुंबई थियेटर गाईड इस शहर में रंगमंच से संबंधित गतिविधियों और समीक्षाओं के बारे में बताता एक जालस्थल है।

1 टिप्पणी

  1. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    इतवार को भी मेहनत। गजब! अच्छा विवरण दिया।

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